दुनिया के बदलते जियोपॉलिटिकल समीकरणों के बीच हाल ही में एक खबर ने सबका ध्यान खींचा — भारत ने तजाकिस्तान में अपना एयरबेस छोड़ दिया है। कई लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? क्या भारत को वहां से हटना पड़ा या यह एक सोची-समझी रणनीति थी? इस पूरे मामले को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाकर देखना होगा कि आखिर तजाकिस्तान में भारत की मौजूदगी शुरू कैसे हुई थी और अब खत्म क्यों हो गई।
🇮🇳 भारत का तजाकिस्तान में स्ट्रेटेजिक इंटरेस्ट
तजाकिस्तान (Tajikistan) एक छोटा लेकिन रणनीतिक रूप से बेहद अहम देश है। मध्य एशिया में स्थित यह देश अफगानिस्तान, चीन और उज़्बेकिस्तान जैसे देशों से घिरा हुआ है। इसकी राजधानी है दुशांबे, और इसकी आबादी करीब 1 करोड़ के आसपास है।
1991 में सोवियत यूनियन (USSR) के टूटने के बाद तजाकिस्तान एक स्वतंत्र राष्ट्र बना। इसी समय भारत ने इस देश के साथ अपने सैन्य और कूटनीतिक रिश्ते मजबूत करने शुरू किए। भारत के लिए तजाकिस्तान का महत्व इसलिए भी बढ़ गया क्योंकि अगर आप पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) से आगे बढ़ते हैं तो सीधा तजाकिस्तान की सीमा शुरू होती है। यानी यह भारत का लगभग “नेबरिंग नेशन” है।
🛩️ भारत के दो एयरबेस – आईनी और फारखोर
कई लोग नहीं जानते कि भारत के तजाकिस्तान में दो एयरबेस थे —
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आईनी एयरबेस (Ayni Airbase)
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फारखोर एयरबेस (Farkhor Airbase)
भारत ने इन दोनों एयरबेस को 2000 के दशक की शुरुआत में डेवलप किया था। इन बेस का आइडिया भारत के तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस और सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के नेतृत्व में आया था। इस प्रोजेक्ट में भारतीय वायुसेना (IAF) और बॉर्डर रोड्स ऑर्गेनाइजेशन (BRO) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
करीब 100 मिलियन डॉलर की लागत से इन बेसों का निर्माण हुआ था, और भारत ने वहां अपने एयरफोर्स कर्मियों और हेलीकॉप्टरों को भी तैनात किया था।
⚙️ क्यों बनाया गया था यह एयरबेस?
इसका मुख्य उद्देश्य था पाकिस्तान और अफगानिस्तान की दिशा में एक स्ट्रेटेजिक एडवांटेज हासिल करना।
अगर भविष्य में भारत और पाकिस्तान के बीच कोई बड़ा संघर्ष होता, तो तजाकिस्तान के एयरबेस से भारत को नॉर्थ से दबाव बनाने में आसानी होती।
इसके अलावा, इन एयरबेसों के ज़रिए भारत अफगानिस्तान में मानवीय सहायता और मेडिकल सपोर्ट भी भेजता था। उदाहरण के लिए, फारखोर एयरबेस के पास भारत ने एक अस्पताल भी बनाया था जहाँ अफगान मिलिट्री के घायल सैनिकों का इलाज किया जाता था।
🕵️ क्या भारत ने एयरबेस छोड़ा?
अब सबसे अहम सवाल — क्या भारत ने तजाकिस्तान से पूरी तरह निकल गया है?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, आईनी एयरबेस से भारत ने 2022 में पूरी तरह से ऑपरेशन बंद कर दिया। भारत और तजाकिस्तान के बीच जो समझौता था, उसकी अवधि 2022 तक थी, और तजाकिस्तान ने इसे आगे रिन्यू नहीं किया।
हालांकि, फारखोर एयरबेस के बारे में अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। यह एयरबेस अभी भी “डॉर्मेंट” यानी निष्क्रिय स्थिति में है, पर पूरी तरह छोड़ा नहीं गया है।
🧩 इसके पीछे क्या कारण हैं?
इस फैसले के पीछे कई थ्योरीज़ सामने आई हैं:
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चीन का दबाव:
चीन ने पिछले कुछ सालों में तजाकिस्तान में अपनी सैन्य और आर्थिक पकड़ काफी बढ़ाई है। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत चीन ने वहां बड़े प्रोजेक्ट शुरू किए हैं। संभव है कि उसने तजाकिस्तान पर भारत के साथ समझौता रिन्यू न करने का दबाव डाला हो। -
रूस का रोल:
रूस का तजाकिस्तान में प्रभाव आज भी बहुत मजबूत है। लेकिन यह मानना गलत होगा कि रूस ने भारत को हटवाया। असल में रूस चाहता है कि भारत क्षेत्रीय सुरक्षा में भूमिका निभाए। इसलिए यह तर्क बहुत मजबूत नहीं माना जा रहा। -
भारत की स्ट्रेटेजिक शिफ्ट:
भारत अब अपने विदेशों में स्थित मिलिट्री बेस का फोकस इंडियन ओशन रीजन पर कर रहा है।-
ओमान के डकम पोर्ट,
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लेगा आइलैंड (सेशेल्स),
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मॉरीशस और मेडागास्कर जैसे देशों में भारत अपनी नौसैनिक मौजूदगी बढ़ा रहा है।
यानी भारत अब “नॉर्थ” की बजाय “इंडियन ओशन” में स्ट्रेटेजिक कंट्रोल मजबूत करने पर ध्यान दे रहा है।
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⚔️ जियोपॉलिटिकल प्रभाव
तजाकिस्तान से भारत का निकलना पाकिस्तान और चीन दोनों के लिए एक छोटी जीत जरूर मानी जा रही है।
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पाकिस्तान के लिए इसलिए कि अब भारत के पास उसके नॉर्थ से एयर स्ट्राइक लॉन्च करने का विकल्प नहीं रहेगा।
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और चीन के लिए इसलिए कि मध्य एशिया में उसका प्रभाव अब और मजबूत हो गया है।
हालांकि, भारत अब जिस तरह इंडियन ओशन में अपने नौसैनिक बेस बढ़ा रहा है, वह आने वाले समय में भारत की जियोपॉलिटिकल ताकत को और विस्तारित करेगा।
🌏 भविष्य की दिशा
भारत का तजाकिस्तान में मौजूद रहना निश्चित रूप से हमारे सामरिक हित में था, लेकिन हालात बदल गए हैं।
आज भारत अपनी रक्षा नीति को “Multi-Theatre Presence” यानी बहु-दिशात्मक उपस्थिति के सिद्धांत पर आगे बढ़ा रहा है।
भविष्य में संभव है कि भारत:
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अफ्रीका के ईस्ट कोस्ट में नए नौसैनिक बेस बनाए,
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इंडो-पैसिफिक रीजन में अपने सहयोगी देशों (जैसे जापान, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस) के साथ साझा बेस ऑपरेट करे,
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और साइबर तथा स्पेस डिफेंस में अपनी क्षमताएं और बढ़ाए।
🔍 निष्कर्ष
2022 में भारत का तजाकिस्तान से एयरबेस छोड़ना एक रणनीतिक पुनर्संतुलन का हिस्सा है, न कि किसी दबाव में लिया गया कदम।
भारत अब जियोपॉलिटिक्स की नई दिशा में आगे बढ़ रहा है — जहाँ उसकी प्राथमिकता है इंडियन ओशन में मजबूत उपस्थिति, टेक्नोलॉजिकल डिफेंस और ग्लोबल पार्टनरशिप।
हालाँकि आईनी एयरबेस से बाहर निकलना एक छोटा झटका जरूर है, लेकिन भारत की बढ़ती सैन्य शक्ति और रणनीतिक सोच इस बात का संकेत देती है कि आने वाले वर्षों में भारत और भी मज़बूत वैश्विक पोजिशन में होगा।
संक्षेप में:
👉 भारत ने तजाकिस्तान में एयरबेस छोड़ा है — लेकिन यह “हार” नहीं, बल्कि एक “रणनीतिक बदलाव” है।
👉 फारखोर एयरबेस अभी भी भारत के पास संभवतः सक्रिय स्थिति में है।
👉 भविष्य में भारत इंडियन ओशन और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपना दबदबा और बढ़ाएगा।
भारत की यह नई दिशा साफ दिखाती है कि हम सीमाओं के पार भी एक ग्लोबल डिफेंस पावर बनने की ओर बढ़ रहे हैं। 🌍🇮🇳